
शोले’ की आत्मा को आकार देने वाले की याद में एक विशेष श्रद्धांजलि
मुंबई। आज, धर्मेंद्र जी के जन्मदिन के अवसर पर, साशा सिप्पी ने इस महान अभिनेता को एक गहन और भावनात्मक श्रद्धांजलि अर्पित की है, जिससे यह स्मरण और भी मार्मिक बन जाता है।
साशा सिप्पी ने कहा, “अगर जी.पी. सिप्पी साहब आज हमारे बीच होते, तो वे धर्म जी को समर्पित इस श्रद्धांजलि को सबसे पहले आगे बढ़ाते, उस महान व्यक्तित्व का सम्मान करने के लिए, जिसने शोले की महानता को परिभाषित किया।”
शोले की विरासत के संरक्षक साशा सिप्पी ने धर्मेंद्र जिन्हें प्यार से धरम-जी कहा जाता था; के निधन के बाद एक दिल से लिखी गई श्रद्धांजलि साझा की है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने संदेश में साशा ने इस खबर को “मेरे लिए एक झटका” बताते हुए गहरा दुख व्यक्त किया।
उन्होंने लिखा, “भारी मन से हम धरम-जी को अलविदा कहते हैं, भारत के अंतिम मैटिनी आइडल, एक सच्चे दिग्गज, जिन्होंने इस राष्ट्र और करोड़ों फिल्म दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। उनकी उदारता और सभी के प्रति दयालुता कभी भुलाई नहीं जा सकेगी।”
अपने पोस्ट में साशा ने लिखा: “अलविदा धरम-जी। एक ऐसी महान शख़्सियत, जिनकी विनम्रता और सादगी ने हर किसी को प्रभावित किया। शोले उनकी आत्मा पर खड़ा हुआ था, और जी.पी. सिप्पी साहब के साथ बिताई यादें मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। मेरी कठिन घड़ियों में उन्होंने मुझे प्रेम और हिम्मत से संभाला। उनका जाना एक खालीपन छोड़ गया है।”
साशा ने यह भी स्वीकार किया कि उनके व्यक्तिगत और पेशेवर संघर्षों के दौरान धर्मेंद्र का समर्थन हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। उनकी उदारता, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन ने चुनौतीपूर्ण समय में उन्हें संभाला | इसी कारण उनका निधन साशा के लिए बेहद व्यक्तिगत आघात है।
साशा की श्रद्धांजलि में धरम-जी की ‘शोले’’ इस महाकाव्य फिल्म में केंद्रीय भूमिका को विस्तार से याद किया गया है। जी.पी. सिप्पी साहब ने फिल्म को धर्मेंद्र को आधार बनाकर गढ़ा था। युवा अमिताभ बच्चन के चयन के समय धर्मेंद्र द्वारा दिया गया समर्थन भारतीय सिनेमा के इतिहास की निर्णायक घटनाओं में से एक है। फिल्म के निर्माण के दौरान धरम-जी ने शोले का भार अपने कंधों पर उठाया, और उसमें ऐसा भावनात्मक ताप व आत्मा भरी जिसने इसकी कालातीत पहचान को आकार दिया। यह पोस्ट साशा और धर्मेंद्र जी के बीच साझा की गई विशेष यादों को भी दर्शाता है।
साशा लिखते हैं: “1999 में जब मुझे सिप्पी लेगेसी और शोले का संरक्षक चुना गया, तब मुझे अपने दादा, महान जी.पी. सिप्पी साहब के साथ धरम-जी से मिलने का सम्मान मिला। 25वीं वर्षगांठ के प्रेस सम्मेलन में धरम-जी सबसे पहले पहुंचे और अंत में गए। धरम-जी और हेमा-जी अलग-अलग पहुंचे, मीडिया से बातचीत की, और निजी लंच में हमारे परिवार तथा जी.पी. सिप्पी साहब के साथ फिल्मों की उन कई ख़ास यादों को साझा किया। पाँच घंटे बाद, धरम-जी और हेमा-जी एक ही कार में साथ निकले!”
उन्होंने आगे कहा, “जब मैंने 2000 में शोले बनाने की योजना बनाई, तो धरम-जी हमेशा सहायक रहे और उन्होंने हर संभव मदद की, यह उनकी उदारता का एक और प्रमाण है। जब मेरे दादाजी जी.पी. सिप्पी साहब का देहांत हुआ और मैं बेहद कठिन समय से गुज़र रहा था, धरम-जी न सिर्फ प्रेरणा का स्रोत बने, बल्कि प्रेम और हौसला देने वाले साथी भी रहे। मैं उन्हें बहुत याद करूंगा।”
धर्मेंद्र एक विशाल विरासत छोड़ गए हैं, जो न सिर्फ सिनेमाई है, बल्कि सांस्कृतिक और व्यक्तिगत रूप से भी हर उस व्यक्ति के लिए गहरी है, जिसने उन्हें जाना। उनकी आत्मा उनके अविस्मरणीय अभिनय, रिश्तों और लाखों दिलों में बसे उनके स्थान के माध्यम से सदैव जीवित रहेगी।
उनके जन्मदिन पर यह श्रद्धांजलि और भी अर्थपूर्ण बन जाती है, एक ऐसे जीवन का उत्सव जिसने भारतीय सिनेमा को आकार दिया और अनगिनत दिलों को छुआ।
यह निर्विवाद है कि यदि जी.पी. सिप्पी साहब जीवित होते, तो शोले के 50 साल का जश्न धर्मेंद्र जी को समर्पित किया जाता। धरम-जी की अनुपस्थिति इस उत्सव को पीड़ादायक बनाती है, और इसलिए हम इस महान मैटिनी आइडल के जीवन को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
साशा ने उन सभी के अद्भुत योगदान को भी याद किया, जिन्होंने शोले को एक कालातीत क्लासिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने हेमा मालिनी जी के प्रति विशेष सम्मान व्यक्त किया, जिनकी गरिमा और शक्ति फिल्म के अभिन्न अंग हैं; अमिताभ बच्चन जी को, जिनका अद्भुत प्रदर्शन भारतीय सिनेमा की एक पीढ़ी को परिभाषित करता है; और जया बच्चन जी को, जिनकी शांत लेकिन दृढ़ उपस्थिति ने कथा को गहराई दी। अमजद खान और संजीव कुमार कहानी की रीढ़ थे।
उन्होंने पूरी कास्ट, प्रतिभाशाली तकनीशियनों, रचनात्मक टीमों, और ब्रिटिश क्रू के समर्पण को भी सराहा, जिनकी तकनीकी दक्षता ने फिल्म की भव्यता को आकार दिया और निस्संदेह जी.पी. सिप्पी साहब को भी। इन सभी की कला, अनुशासन और जुनून शोले की अमर विरासत की नींव हैं।




